NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 12 - कच्चा चिट्ठा

Question 1:

पसोवा की प्रसिद्धि का क्या कारण था और लेखक वहाँ क्यों जाना चाहता था ?

Answer:

पसोवा एक बहुत बड़ा जैन तीर्थ था। वहाँ प्राचीनकाल से प्रतिवर्ष जैनों का बहुत बड़ा मेला लगता था। जिसमें दूर-दूर से हज़ारों की संख्या में जैन यात्री आकर सम्मिलित होते थे। इसी स्थान पर एक छोटी-सी पहाड़ी थी जिसकी गुफा में बुद्धदेव व्यायाम करते थे। वहाँ एक विषधर सर्प भी रहता था। एक किंवदंती के अनुसार इसके पास सम्राट अशोक ने एक स्तूप बनवाया था जिसमें महात्मा बुद्ध के थोड़े-से केश और नखखंड रखे गए थे। लेखक वहाँ इसलिए जाना चाहता था ताकि वहाँ से वह अपने संग्रहालय के लिए कोई-न-कोई अनमोल वस्तु ला सके।

Question 2:

''मैं कहीं जाता हूँ तो 'घूँछे हाथ नहीं लौटता" से क्या तात्पर्य है ? लेखक कौशांबी लौटते हुए अपने साथ क्या-क्या लाया ?

Answer:

मैं कहीं जाता हूँ तो घूँछे हाथ नहीं लौटता से तात्पर्य यह है कि लेखक जिस स्थल पर भी जाता है वहाँ से वह खाली हाथ नहीं लौटता। वहाँ से कोई न कोई वस्तु अपने संग्रह हेतु लेकर आता है। लेखक कौशांबी लौटते समय अपने साथ कुछ अच्छी मूर्तियाँ, सिक्के और मनके लाया।

Question 3:

''चांद्रायण व्रत करती हुई बिल्ली के सामने एक चूहा स्वयं आ जाए तो बेचारी को अपना कर्तव्य-पालन करना ही पड़ता है।" लेखक ने यह वाक्य किस संदर्भ में कहा और क्यों ?

Answer:

लेखक ने यह वाक्य मनुष्य की लालची प्रवृत्ति के संदर्भ में कहा है क्योंकि मनुष्य में स्वाभाविक रूप से लालच की प्रवृत्ति निहित होती है। यह प्रवृत्ति परिस्थितिवश किसी वस्तु को देखकर स्वत: ही जागृत हो जाती है और व्यक्ति किसी सुंदर वस्तु को देखकर उसे पाने हेतु ललचा उठता है, ठीक वैसे ही जैसे चांद्रायण व्रत करती हुई बिल्ली सामने आनेवाले चूहे को देखकर ललचा उठती है।

Question 4:

''अपना सोना खोटा तो पखवैया का कौन दोस" से लेखक का क्या तात्पर्य है ?

Answer:

'अपना सोना खोटा तो पखवैया का कौन दोस' से लेखक का तात्पर्य है कि जब व्यक्ति के अंदर ही कमी हो तो किसी को क्या दोष दिया जा सकता है। लेखक यहाँ-वहाँ से मिलनेवाली मूर्तियों का अपने संग्रहालय के लिए उठा लिया करता था। इसलिए मंडल से कोई भी मूर्ति गुम होने पर सभी का संदेह लेखक पर होता था। संदेह होना भी स्वाभाविक था। इसीलिए लेखक ने ऐसा कहा है।

Question 5:

गाँववालों ने उपवास क्यों रखा और उसे कब तोड़ा ? दोनों प्रसंगों को स्पष्ट कीजिए।

Answer:

जब गाँव से चतुर्मुख शिव महाराज की मूर्ति अंतर्धान हो गई। गाँववालों को लगा कि न जाने शिव नाराज़ होकर कहाँ चले गए हैं। इसलिए उन्होंने उपवास रखा। गाँववालों ने अपना उपवास तब तोड़ा जब उनको लेखक ने अपने संग्रहालय से सम्मान सहित मूर्ति सौंप दी। स्त्री-पुरुष सब मूर्ति के सामने बैठकर गाने लगे।

Question 6:

लेखक बुढ़िया से बोधिसत्व की आठ फुट लंबी सुंदर मूर्ति प्राप्त करने में कैसे सफल हुआ?

Answer:

लेखक ने बुढ़िया से बोधिसत्व की आठ फुट लंबी सुंदर मूर्ति प्राप्त करने के लिए मुद्रा की झनझनाहट का आश्रय लिया। उसने अपनी जेब में पड़े रुपयों को ठनठनाया। लेखक ने बुढ़िया को दो रुपए देते हुए कहा कि ये दो रुपए आप ले लो इससे आपका नुकसान पूरा हो जाएगा। लेखक ने कहा कि यह मूर्ति यहाँ पड़ी-पड़ी क्या करेगी? यह यहाँ किसी काम में आने वाली नहीं है। यह बात बुढ़िया की समझ में आ गई। जब लेखक ने बुढ़िया के हाथ में रुपया रख दिया तो उसने मूर्ति देने की इज़ाजत दे दी। इस प्रकार लेखक बुढ़िया से बोधिसत्व की आठ फुट लंबी सुंदर मूर्ति प्राप्त करने में सफल हुआ।

Question 7:

'ईमान! ऐसी चीज़ मेरे पास हुई नहीं तो उसके डिगने का कोई सवाल नहीं उठता। यदि होता तो इतना बड़ा संग्रह बिना पैसा-कोड़ी के हो ही नहीं सकता।"—के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है ?

Answer:

लेखक इन पंक्तियों के माध्यम से यह कहना चाहता है कि ईमान जैसी चीज़ इसके पास नहीं है। क्योंकि यदि मैं ईमान का सहारा लेकर जीवन जीता तो कभी भी बिना पैसे के इतना बड़ा संग्रह नहीं कर सकता था। अत: मैंने अपने ईमान को ठेस पहुँचाकर यहाँ-वहाँ से जोड़-तोड़ करके वस्तुओं का संग्रह किया है। ईमान व्यक्ति को धोखाधड़ी, छल आदि कार्यों से रोकता है लेकिन मैंने ऐसा अनेक बार किया है। लेकिन निजी स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि संग्रहालय को आगे बढ़ाने के लिए।

Question 8:

दो रुपए में प्राप्त बोधिसत्व की मूर्ति पर दस हज़ार रुपए क्यों न्योछावर किए जा रहे थे?

Answer:

बोधिसत्व की यह आठ फुट लंबी मूर्ति अब तक संसार में पाई गई मूर्तियों में सबसे पुरानी थी। उसके पदस्थल पर यह लेख लिखा हुआ था कि यह कुषाण सम्राट कनिष्क के राज्यकाल के दूसरे वर्ष स्थापित की गई थी। इस मूर्ति के चित्र और वर्णन भी अनेक विदेशी पत्रों में छप चुके थे। अत: यह संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध हो चुकी थी। इसीलिए दो रुपए में प्राप्त बोधिसत्व की मूर्ति पर दस हज़ार रुपए न्योछावर किए जा रहे थे।

Question 9:

भद्रमथ शिलालेख की क्षतिपूर्ति कैसे हुई ? स्पष्ट कीजिए।

Answer:

एक बार लेखक यह सोचकर हजियापुर गाँव गए कि वहाँ और भी भद्रमथ के शिलालेख हो सकते हैं। वे गुलज़ार मियाँ के यहाँ ठहरे। गुलज़ार मियाँ के मकान के सामने उन्हीं का एक सुंदर कुआँ था। उसके चबूतरे के ऊपर चार पक्के खंभे बने थे जिनमें एक से दूसरे तक अठपहल पत्थर की बँडेर पानी भरने के लिए गड़ी हुई थी। अचानक लेखक की दृष्टि एक बँडेर पर गई जिसके ऊपर ब्राह्मी लिपि के अक्षरों में एक लेख लिखा था। लेखक उसे देखते ही पाने के लिए उतावला हो उठा। उनकी इच्छा को देखकर गुलज़ार मियाँ ने उसको तुरंत निकालकर लेखक को सौंप दिया। इस प्रकार भद्रमथ शिलालेख की क्षतिपूर्ति हुई।

Question 10:
लेखक अपने संग्रहालय के निर्माण में किन-किनके प्रति अपना आभार प्रकट करता है और किसे अपने संग्रहालय का अभिभावक बनाकर निश्चिंत होता है ?

Answer:

लेखक अपने संग्रहालय के निर्माण में राम बहादुर कामता प्रसाद ककड़ (तात्कालीन चेयरमैन), हिज़ हाइनेस, श्री महेंद्र सिंह नरेश, दीवान लाल, भागवेंद्रसिंह तथा अर्दली जगदेव के प्रति अपना आभार प्रकट करता है। वह डॉ० सतीश चंद्र काला को एक सुयोग्य अभिभावक बताकर निश्चिंत होता है।