NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 18 - कुटज

Question 1:

कुटज को 'गाढ़े के साथी' क्यों कहा गया है ?

Answer:

कुटज को 'गाढ़े के साथी' इसलिए कहा गया है क्योंकि कभी इसी कुटज ने कालिदास के दुखी हृदय को सहारा प्रदान किया था।

शिवालिक की अत्यंत उच्च चोटियों पर उन्हें केवल यही एक सहारा मिला था जिसने सांत्वना देकर धैर्य प्रदान किया था।

Question 2:

'नाम' क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।

Answer:

'नाम' इसलिए बड़ा नहीं होता कि वह कोई विशेष नाम है बल्कि वह इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है। सामाजिक सरोकार ही नाम को बड़ा बनाते हैं। 'नाम' समाज का दिया हुआ एक सत्य है। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है।

Question 3:

'कुट', 'कुटज' और 'कुटनी' शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।

Answer:

'कुट' का शाब्दिक अर्थ है—घर या घड़ा। 'कुटज' का शाब्दिक अर्थ है—घर में पैदा होनेवाला या घड़े में पैदा होनेवाला। 'कुटनी' एक गलत ढंग से कार्य करनेवाली दासी को कहा जाता है। कुट का अर्थ घड़ा या घर से लगाया जाता है। संस्कृत में 'कुटहारिका' और 'कुटकारिका' दासी को कहते हैं। 'कुटिया' और 'कुटीर' शब्द भी कदाचित इसी शब्द से संबद्ध हैं। इसी शब्द का अर्थ घर भी है। अत: घर में काम-काज करनेवाली दासी कुटकारिका तथा कुटहारिका कही जा सकती है। इसी के समान एक गलत ढंग से कार्य करनेवाली दासी को कुटनी कहा जाता है।

Question 4:

कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवन-शक्ति की घोषणा करता है ?

Answer:

कुटज अपनी अपराजेय जीवन-शक्ति की घोषणा करता है कि जीवन में चाहे सुख हो या दुख, कोई प्रिय हो या अप्रिय जो कुछ भी मिले उसे हृदय से पूर्णत: अपराजित होकर शान के साथ उल्लास सहित ग्रहण करना चाहिए। कभी भी विपरीत परिस्थितियों से हार नहीं माननी चाहिए। जीवन की अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए। जीवन से कभी हार नहीं माननी चाहिए।

Question 5:

'कुटज' हम सभी को क्या उपदेश देता है ? टिप्पणी कीजिए।

Answer:

कुटज हम सभी को संघर्षरत तथा कर्मशील जीवन जीने का उपदेश देता है। वह कहता है कि यदि तुम जीना चाहते हो तो कठोर पत्थरों को काटकर पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य ग्रहण करो। वायुमंडल को चूसकर तथा आँधी-तूफान को मिटाकर अपना प्राप्य वसूल करो। असीम आकाश को चूमकर तथा अवकाश की लहरों में झूमकर जीवन में उल्लास तथा आनंद पैदा करो।

Question 6:

कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है ?

अथवा

''कुटज में न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध, फिर भी लेखक ने उसमें मानव के लिए एक संदेशा पाया है।'' इस कथन की पुष्टि करते हुए बताइए कि संदेश क्या है ?

Answer:

कुटज के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि मनुष्य को निरंतर संघर्षरत तथा कर्मशील रहना चाहिए। जीवन में आनेवाली प्रत्येक परिस्थिति का साहसपूर्ण सामना करना चाहिए। अपने बल तथा परिश्रम के द्वारा अपनी इच्छाओं की पूर्ति करनी चाहिए। जीवन की अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित नहीं होना चाहिए। सुख-दुख, राग-विराग, प्रिय-अप्रिय, हार-जीत जो भी मिले हृदय से अपराजित होकर शान के साथ आनंदपूर्वक ग्रहण करनी चाहिए। कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। मनुष्य के मन को अपने वश में करके जीना चाहिए क्योंकि जिसका मन वश में हो वही मनुष्य सुखी होता है। परवश मनुष्य सदैव दुखी रहता है।

Question 7:

कुटज क्या केवल जी रहा है?—लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है ?

Answer:

कुटज क्या केवल जी रहा है? लेखक ने यह प्रश्न उठाकर निम्नांकित मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है—

(i) कुटज कभी दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता।

(ii) किसी के निकट आ जाने पर भय से नहीं काँपता।

(iii) समाज में यहाँ-वहाँ भटकता हुआ नीति-धर्म का उपदेश देता नहीं घूमता।

(iv) वह अपनी उन्नति के लिए अफ़सरों के जूते नहीं चाटता।

(v) वह दूसरों को अपमानित करने हेतु ग्रहों की खुशामद नहीं करता।

(vi) अपनी उन्नति के लिए नीलम धारण नहीं करता और न ही अँगूठियों की लड़ी पहनता है।

(vii) वह न तो दाँत निपोरता है और न ही किसी की बगलें झाँकता है।

Question 8:

दुनिया में त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, परार्थ नहीं है, परमार्थ नहीं है—है केवल प्रचंड स्वार्थ। भीतर की जिजीविषा-जीते रहने की प्रचंड इच्छा ही-अगर बड़ी हो तो फिर यह सारी बड़ी-बड़ी बोलियाँ जिनके बल पर दल बनाए जाते हैं, शत्रुमर्दन का अभिनय किया जाता है, देशोद्धार का नारा लगाया जाता है, साहित्य और कला की महिमा गाई जाती है, झूठ है। इसके द्वारा कोई-न-कोई अपना बड़ा स्वार्थ सिद्ध करता है। लेकिन अंतरतर से कोई कह रहा है, ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है।

Answer:

प्रसंग—यह गद्यावतरण 'अंतरा भाग-2' में संकलित पाठ 'कुटज' शीर्षक निबंध से लिया गया है। इसमें लेखक ने बताया है कि दुनिया केवल स्वार्थ पर आधारित है। हर कहीं केवल स्वार्थ ही स्वार्थ दृष्टिगोचर होता है। व्याख्या—लेखक का कथन है कि दुनिया में त्याग, प्रेम और परमार्थ की भावना नहीं है। चारों तरफ केवल प्रचंड स्वार्थ की भावना ही दिखाई देती है। यदि अंतर्मन में निहित जीने की इच्छा ही बड़ी बात हो तो फिर यह सारी बड़ी-बड़ी बोलियां जिनके आधार पर दल बनाए जाते हैं, शत्रु को मारने का अभिनय किया जाता है। देश के उद्धार का नारा लगाया जाता है, साहित्य और कला की महिमा गाई जाती है यह सब असत्य है। इसके माध्यम से कोई न कोई अपना बड़ा स्वार्थ सिद्ध करता है। लेकिन अंतर्मन से कोई कहता है कि ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है।

विशेष— (i) दुनिया में प्रचलित स्वार्थ भावना का उल्लेख है जिसके सामने सर्वस्व कुर्बान किया जाता है।

(ii) भाषा सरल, सहज, खड़ी बोली है।

(iii) तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।

Question 9:

कुटज पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।

Answer:

दुख और सुख मानव मन के विकल्प हैं। मानव जीवन में दुख और सुख धूप-छाया के समान आते-जाते रहते हैं। दुख के बाद सुख तथा सुख के बाद दुख की अनुभूति होना अनिवार्य है। मानव जीवन में सुखी वही है जिसका मन वश में है। जिसका मन परवश है वह हमेशा दुखी रहता है। परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, दाँत निपोरना, चापलूसी करना, हाँ-हज़ूरी करना। जिस मनुष्य का मन अपने वश में नहीं है वह दूसरे मन के परदे खोलता रहता है। अपने-आप को छिपाने के लिए झूठे आडंबर रचता है तथा दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है।

Question 10:

निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए—

(क) 'कभी-कभी' जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़े काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।

(ख) 'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिसपर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे 'सोशल सैक्शन' कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात।'

(ग) 'रूप की तो बात ही क्या है ! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण नि:श्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत सें बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।'

(घ) 'हृदयेनापराजित: ! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दु:ख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा ! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!'

Answer:

(क) प्रसंग—प्रस्तुत पंक्तियाँ 'अंतरा भाग—2' में संकलित तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'कुटज' नामक निबंध से अवतरित हैं। इसमें लेखक ने बेहया लोगों की आंतरिक शक्ति का वर्णन किया है। व्याख्या—लेखक का मत है कि मानव जीवन में कभी-कभी जो लोग बाह्य रूप से बेशर्म दिखाई देते हैं उनकी जड़ें भी काफ़ी गहन प्रवेश करके बैठी रहती हैं अर्थात वे भी अंदर से काफ़ी मज़बूत होते हैं। ऐसे लोग भी पत्थरों की छाती चीरकर न जाने किस असीम गड्ढे से अपने भोगने हेतु आवश्यक वस्तुएँ खींच लाते हैं। वे भी अपनी शक्ति के प्रयोग से असंभव को भी संभव कर दिखाते हैं।

विशेष— (i) लेखक ने बेशर्म लोगों की आंतरिक शक्ति का चित्रण किया है।

(ii) भाषा सहज, सरल खड़ी बोली है।

(iii) तत्सम, तद्भव तथा विदेशी शब्दावली का प्रयोग है।

(ख) प्रसंग—यह अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'कुटज' नामक निबंध से अवतरित है। इसमें लेखक ने रूप तथा नाम की व्याख्या प्रस्तुत की है।

व्याख्या—लेखक कहता है कि रूप तो व्यक्तिगत रूप से सत्य होता है जबकि नाम सामाजिक रूप से सत्य होता है। नाम के साथ सामाजिक सरोकार जुड़े रहते हैं। नाम उस पद समूह को कहते हैं जिसपर समाज की मोहर लगी होती है। जो समाज द्वारा सत्यापित होता है। वर्तमान युग में शिक्षित लोग जिसे सोशल सैक्शन कहते हैं। लेखक कहता है कि मेरा मन केवल नाम के लिए व्याकुल है जो समाज द्वारा स्वीकार किया गया है। इतिहास द्वारा प्रमाणित है तथा जो सामूहिक मानव की हृदय रूपी गंगा में स्नान किए हुए हैं।

विशेष— (i) लेखक ने नाम को समाज, इतिहास द्वारा प्रमाणित किया है।

(ii) भाषा-शैली सरल तथा सरस है।

(iii) तत्सम शब्दावली की अधिकता है।

(ग) प्रसंग—प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक 'अंतरा भाग—2' में संकलित तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'कुटज' नामक पाठ से ली गई हैं। इनमें लेखक ने सूखी शिवालिक चोटियों में सरस कुटज की शोभा का वर्णन किया है। 'नाम' के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। व्याख्या—द्विवेदी जी का निबंध के माध्यम से मानना है कि नाम का महत्त्व बहुत ऊँचा होता है। वह केवल पहचान मात्र नहीं होता। वह इसलिए बड़ा होता है उसे उसी के आधार पर समाज में पहचाना जाता है। उसे उसी नाम से समाज में जाना-पहचाना जाता है; उसी से सामाजिक स्वीकृति की प्राप्ति होती है। उसी से उस की समाज में निन्दा या प्रशंसा होती है। नाम तो किसी भी व्यक्ति के लिए पहचान होती है, वही समाज में उस को पहचान देती है। उसी से उस पर समाज की पहचान रूपी मोहर लगती है। आज का शिक्षित वर्ग 'सोशल सैक्शन' कहा जाता है। समाज में रहने वाले सारे इन्सान अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं। लेखक का मानना है कि उस का मन नाम के लिए व्याकुल है। वह परेशान है। समाज के द्वारा स्वीकार कर लिया जाने वाला नाम उसे स्वीकृत है। नियम वही चलते हैं जिन्हें समाज स्वीकार कर लेता है। वही अन्तत: समाज में अनुशासन और नियंत्रण का कार्य करते हैं।

विशेष— (i) लेखक ने नाम के महत्त्व की विशिष्टता को प्रस्तुत किया है।

(ii) तत्सम-तद्भव शब्दावली की अधिकता है।

(iii) अंग्रेजी शब्दों का सहज प्रयोग किया गया है।

(iv) वर्णनात्मक और व्यंजक शैली का सहज प्रयोग है।