NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 1 - साखी

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The chapter “Sakhi” of Hindi Class 10th main textbook is a poem written by a famous poet, Kabir. It is a Doha verse wherein there is a description of eight sakhis which tells about the different aspects of life. The poem tells people to go along with their Sakhi for their own betterment.

Question 1:

मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?

अथवा

कबीर ने कैसी वाणी बोलने की सलाह दी है?

Answer:

कबीरदास कहते हैं कि मनुष्य को सदैव मधुर वचन बोलने चाहिए। मीठी वाणी बोलने से उसे सुनने वाला सुख का अनुभव करता है, क्योंकि मीठी वाणी जब हमारे कानों तक पहुँचती है तो उसका प्रभाव हमारे हृदय पर होता है। इसके विपरीत किसी के द्वारा कहे गए कड़वे वचन तीर की भाँति हृदय में चुभने वाले होते हैं। जब हम मीठे वचनों का प्रयोग करते हैं, तो हमारा अहंकार नष्ट हो जाता है। अहंकार के नष्ट होने पर हमें शीतलता प्राप्त होती है। इस प्रकार मीठी वाणी बोलने से न केवल दूसरों को हम सुख प्रदान करते हैं, अपितु स्वयं भी शीतलता को अनुभव करते हैं।

Question 2:

दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

Answer:

कबीरदास के अनुसार जिस प्रकार दीपक के जलने पर अंधकार अपने आप दूर हो जाता है, उसी प्रकार हृदय में ज्ञानरूपी दीपक के जलने पर अज्ञानरूपी अंधकार दूर हो जाता है। जब तक मनुष्य में अज्ञान रहता है, तब तक उसमें अहंकार और अन्य दुर्गुण होते हैं। वह अपने ही हृदय में निवास करने वाले ईश्वर को पहचान नहीं पाता। अज्ञानी मनुष्य अपने आप में डूबा रहता है। लेकिन जैसे ही उसके हृदय में ज्ञानरूपी दीपक जलता है, उसका हृदय प्रकाशित हो उठता है। ज्ञानरूपी दीपक के जलते ही मनुष्य का अज्ञानरूपी अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान के दीपक के जलने पर मनुष्य ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर चल पड़ता है।

Question 3:

ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?

Answer:

कबीरदास का मानना है कि निर्गुण ब्रह्म कण-कण में समाया हुआ है, किंतु अपनी अज्ञानता के कारण हम उसे नहीं देख पाते। जिस प्रकार कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ हिरण की अपनी नाभि में ही विद्यमान होता है लेकिन वह उसे जंगल में इधर-उधर ढूँढ़ता है; उसी प्रकार मनुष्य भी अपने हृदय में छिपे ईश्वर को अपनी अज्ञानता के कारण पहचान नहीं पाता। वह ईश्वर को धर्म के अन्य साधनों जैसे मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा आदि में व्यर्थ ढूँढ़ता है। कबीरदास का मत है कि कण-कण में छिपे परमात्मा को देखने के लिए ज्ञान का होना अति आवश्यक है।

Question 4:

संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ 'सोना' और 'जागना' किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।

Answer:

कबीरदास के अनुसार जो व्यक्ति केवल सांसारिक सुखों में डूबा रहता है और जिसके जीवन का उद्देश्य केवल खाना, पीना और सोना है, वही व्यक्ति सुखी है। इसके विपरीत जो व्यक्ति संसार की नश्वरता को देखकर ईश्वर प्राप्ति के लिए रोता है, वह दुखी है।

यहाँ 'सोना' शब्द सांसारिक सुखों में डूबे रहने का प्रतीक है तथा 'जागना' ज्ञान प्राप्त होने का प्रतीक है। इन शब्दों का प्रयोग कवि ने यह बताने के लिए किया है कि मूर्ख व्यक्ति अपना जीवन यूँ ही निश्चित रहकर नष्ट कर देता है। दूसरी ओर ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि संसार नश्वर है। वह ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है और दुखी रहता है। वह चाहता है कि मनुष्य भौतिक सुखों को त्यागकर ईश्वर-प्राप्ति की ओर अग्रसर हो।

Question 5:

अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?

अथवा

कबीर के विचार से निंदक को निकट रखने के क्या-क्या लाभ हैं?

Answer:

कबीर का मानना है कि अपने स्वभाव को निर्मल रखने का सबसे अच्छा उपाय निंदा करने वाले को अपने साथ रखना है। निंदा करने वाले को घर में अपने आस-पास रखना चाहिए। ऐसा करने से हमारा स्वभाव अपने आप ही निर्मल हो जाएगा, क्योंकि निंदा करने वाला व्यक्ति हमारे गलत कार्यों की निंदा करेगा तो हम अपने आप को सुधारने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार निंदा करने वाले व्यक्ति के पास रहने पर हम धीरे-धीरे अपने स्वभाव को बिलकुल निर्मल कर लेंगे। इस तरह उसके द्वारा बताए गए अपने अवगुणों को दूर करके हम अपने स्वभाव को निर्मल बनाने में सफल हो सकते हैं।

Question 6:

'एकै आषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ'—इस पंक्ति के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?

Answer:

इस पंक्ति के द्वारा कवि स्पष्ट करना चाहता है कि जो व्यक्ति अपने प्रिय परमात्मा के प्रेम का अक्षर पढ़ लेता है, वही ज्ञानवान है।

कुछ लोग बड़े-बड़े धर्मग्रंथों को पढ़कर अपने आपको विद्वान और ज्ञानवान सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। कबीर का मत है कि वेदों, पुराणों और उपनिषदों को पढ़ने से कोई लाभ नहीं होता। इनको पढ़ना व्यर्थ है। इसके विपरीत जो ईश्वर-प्रेम के मार्ग को अपनाकर उसमें डूब जाता है, वही वास्तविक विद्वान और ज्ञानवान है।

Question 7:

कबीर की उद्घत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।

Answer:

कबीर द्वारा रचित इन साखियों की भाषा सधुक्कड़ी है। इसमें अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, पूर्वी हिंदी तथा पंजाबी के शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है। कहीं-कहीं इन्होंने पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया है, किंतु अधिकांश साखियों में प्राय: बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। इन साखियों में कबीरदास ने सामान्य भाषा में भी लोक व्यवहार की शिक्षा दी है। जैसे—

ऐसी बाँणी बोलिए, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥

कबीर की भाषा में कहीं-कहीं बौद्धिकता के भी दर्शन होते हैं। यह बौद्धिकता प्राय: उपदेशात्मक साखियों में अधिक है। दोहा छंद में लिखी गई इन साखियों में मुक्तक शैली का प्रयोग है तथा गीति-तत्व के सभी गुण विदमान हैं। भाषा पर कबीर के अधिकार को देखते हुए ही डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें 'वाणी का डिक्टेटर' कहा है।

Question 8:

बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।इस पंक्ति के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?

Answer:

कबीरदास का कहना है कि जब विरहरूपी सर्प शरीर में बैठ जाता है, तो विरही व्यक्ति सदा तड़पता है। उस पर किसी प्रकार के मंत्र का कोई प्रभाव नहीं होता। जब आत्मा अपने प्रिय परमात्मा की विरह में तड़पती है, तो वह केवल अपने प्रिय परमात्मा के दर्शन पाकर ही शांत होती है। विरहरूपी सर्प आत्मा को तब तक तड़पाता है, जब तक परमात्मा के दर्शन नहीं हो जाते।

Question 9:

कस्तूरी कुंडलि बसैं, मृग ढूँढ़ै बन माँहि।इस पंक्ति के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?

Answer:

कवि यहाँ यह स्पष्ट करना चाहता है कि हिरण की अपनी नाभि में ही कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ होता है। जब हिरण को उसकी सुगंध आती है तो वह उसे इधर-उधर खोजता है, किंतु वह उसे ढूँढ़ नहीं पाता। इसी प्रकार ईश्वर भी मनुष्य के हृदय में विद्यमान है, किंतु मनुष्य अज्ञानतावश उसे पहचान नहीं पाता। वह ईश्वर को अन्य स्थानों पर खोज रहा है, जोकि व्यर्थ है।

Question 10:

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।इस पंक्ति के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?

Answer:

यहाँ कबीरदास के कहने का भाव है कि जब तक मनुष्य में 'मैं' अर्थात अहंकार की भावना होती है, तब तक वह ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। मनुष्य जैसे ही अपने भीतर से अहंकार की भावना को नष्ट कर देता है, ईश्वर को सहजता से पा लेता है। ईश्वर को पाने के लिए अहंकार को त्यागना आवश्यक है।

Question 11:

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।इस पंक्ति के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?

Answer:

कबीरदास का मत है कि धार्मिक ग्रंथ आदि पढ़ने से कोई व्यक्ति विद्वान अथवा बुद्धिमान नहीं बनता। जो व्यक्ति ईश्वर-प्रेम को जान लेता है, वही सच्चा विद्वान है। धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर स्वयं को विद्वान और ज्ञानी कहने वाले अनेक लोग मिट जाते हैं, किंतु ईश्वर-प्रेम के एक अक्षर को समझने वाला व्यक्ति अमर हो जाता है।

Question 12:

पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप उदाहरण के अनुसार लिखिए—
उदाहरण: जिवै — जीना
औरन, माँहि, देख्या, भुवंगम, नेड़ा, आँगणि, साबण, मुवा, पीव, जालौं, तास।

Answer:

Question 13:

'साधु में निंदा सहन करने से विनयशीलता आती है' तथा 'व्यक्ति को मीठी व कल्याणकारी वाणी बोलनी चाहिए'—इन विषयों पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।

Answer:

विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

Question 14:

कस्तूरी के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।

Answer:

कस्तूरी एक सुगंधित पदार्थ होता है, जो 'कस्तूरी' नामक मृग की नाभि में होता है। भारत में यह मृग हिमालय के वन्य क्षेत्र में पाया जाता है। वर्तमान समय में अनेक लोग कस्तूरी के लिए इस मृग का शिकार कर रहे हैं, जिससे उनकी संख्या तेजी से कम हो रही है। यही कारण है कि कस्तूरी मृग को दुर्लभ और संरक्षित प्रजाति घोषित किया गया है।